Wednesday, January 11, 2012

ऑनलाइन रीडिंग जोन

न्यू ईयर सेलिब्रेशन खत्म हो चुका है। नई योजनाओं, नए रेजोल्यूशंस, नए सपनों और नई अपेक्षाओं के साथ नए साल की शुरुआत हो चुकी है। हमारे कॉलेज गोइंग साथियों की क्लासेज भी शुरू हो चुकी हैं। यानि अब मस्ती वाले माहौल और दोस्तों से दूर किताबों से दोस्ती करने का समय आ गया है। बात जब दोस्ती की हो रही है, तो यह भी सच्चाई है कि किताबों से बेहतर हमारा कोई दोस्त नहीं होता। एक सच यह भी है कि हर समय कोर्स की किताबों में लगे रहना कभी-कभी बोर कर जाता है। ऐसे में लिट्रेचर की किताबें पढऩा एक बेहतर विकल्प हो सकता है। लिट्रेचर की किताबें न सिर्फ हमारा मनोरंजन करती हैं, बल्कि यह हमें जिंदगी को नए तरीके से देखने का नजरीया भी देती हैं। इंटरनेट की दुनिया में ऐसे कई वेबसाइट्स हैं, जो हमें ऑनलाइन रीडिंग जोन उपलब्ध कराते हैं। एक ऐसा ही साइट है 'रीड प्रिंट'।

इस साइट पर इंग्लिश लिट्रेचर में एसेज, फिक्शन, नॉन-फिक्शन, प्ले, पोएट्री और शॉर्ट स्टोरीज सेक्शंस की कई नई और क्लासिकल किताबें उपलब्ध हैं। रुचि के अनुसार किताबों को ढूंढने के लिए यहां इन सेक्शंस के अलावा फेवरिट ऑथर्स और होमपेज पर नीचे की ओर एक बुक गैलेरी के अलावा रीडर्स के रुझान के आधार पर टॉप फाइव बुक्स और ऑथर्स सरीखे लिस्ट भी दिए गए हैं। बुक सलेक्शन कर बुक के इमेज या नाम पर क्लिक करते ही हमें रीड ऑनलाइन, बाय, राइट ए रिव्यू जैसे ऑप्शंस दिए जाते हैं। यहां से रीड ऑनलाइन के ऑप्शन पर क्लिक करते ही हमारे सामने सेलेक्टेड बुक के डिफरेंट चैपटर्स की लिस्ट आ जाती है। यहां से चैप्टर सलेक्ट कर उस चैप्टर के कंटेट को पढ़ा जा सकता है।

होमपेज पर ऑपशन्स की बात करें तो यहां ऑनलाइन बुक्स का सेक्शन है, जो बुक सेलेक्शन में मदद कर सकता है। फाइंड बुक्स में हम की-वर्ड टाइप कर बुक ढूंढ सकते हैं। एक और मजेदार ऑप्शन ब्राउज कोट्स हैं, जहां ऑथर्स या सब्जेक्ट्स के अनुसार फेमस कोटेशन्स को ढूंढा और पढ़ा जा सकता है। 
वेबसाइट का पता है-   
www.readprint.com
राजस्थान पत्रिका के एजुकेशन सप्लीमेंट ' मी नेक्स्ट ' में दिनांक - 08 जनवरी 2012  को प्रकाशित। 

Saturday, January 7, 2012

लेट्स रॉक दिस सीजन

सर्दी का मौसम, फेस्टिव सीजन की उमंग और नए साल का शुभारंभ।  यानि गाने-बजाने और झूमने के लिए एकदम परफेक्ट टाइमिंग। दोस्तों के साथ न्यू ईयर पार्टी और खूब सारी मस्ती। नए साल का यह माहौल ही रेजोल्यूशंस और नई योजनाएं बनाने के लिए रोमांचित करता है। ऐसे में क्यों न इस बार नए साल में कुछ ऐसा सीखा जाए, जो रिदमिक और क्रिएटिव तो हो ही साथ ही फुर्सत के पलों में कुछ सुकून भी दे जाए। 'गिटार' !  बताने की जरूरत नहीं कि इस शब्द के उच्चारण मात्र से ही मन के तार झनझना उठते हैं। हम चाहे कितने भी तनाव में क्यों न हों, झनझनाते तारों की सरगम हमें सुकून दे जाती है। यदि यह सब इतना सुकून देने वाला है, तो क्यों न नए साल में कुछ समय गिटार और म्यूजिक को भी दिया जाए। यह न सिर्फ हमारी क्रिएटिविटी को बढ़ाने में सहायक है, बल्कि यदि इसमें महारत हासिल की जाए, तो हम इसे बतौर प्रोफेशन भी अपना सकते हैं। म्यूजिक इंडस्ट्री में एक अच्छे गिटारिस्ट को हमेशा सराहा जाता है। इसके अलावा कुछ साथी मिलकर रॉक बैंड का निर्माण कर लाइव शोज और परफॉर्मेन्स भी दे सकते हैं।

हमारा आज का वेबसाइट 'जैम प्ले' आपको घर बैठे गिटार की टे्रनिंग देता है। यह साइट बिगिनर और पहले से गिटार बजा रहे दोनों तरह के साथियों के लिए लाभदायक है। वेबसाइट पर लेसंस, लाइव परफॉर्मेन्स, टीचर्स आदि के सेक्शंस बने हुए हैं। लेफ्ट और राइट साइड में गिटार, बिगिनर, जॉनर और सांग लेसंंस के ऑप्शंस भी एवेलबल हैं। संबंधित ऑप्शन पर क्लिक करते ही वीडियो की मदद से हमारी ट्रेनिंग शुरू हो जाती है। ध्यान रहे इसके लिए आपके ब्राउजर का फ्लैशप्लेयर अपडेटेड हो, ताकि वीडियो आसानी से प्ले हो जाए। साइट पर 'लेसंस' सेक्शन के अंदर बेसिक, स्टाइल एंड जॉनर, स्किल बिल्डिंग जैसे  कई ऑप्शन दिए गए हैं, जहां से आप इलेक्ट्रिक और एकॉस्टिक गिटार के साथ ही ब्लूज, मेटल, रॉक, क्लासिकल, जैज आदि जॉनर का चयन कर सकते हैं। लेट्स 

वेबसाइट का पता है-  www.jamplay.com

राजस्थान पत्रिका के एजुकेशन सप्लीमेंट ' मी नेक्स्ट ' में दिनांक - 01 जनवरी 2012  को प्रकाशित। 

Monday, December 19, 2011

प्रोग्रामिंग की पाठशाला


कंप्यूटर और इसकी तकनीक की सबसे अच्छी बात यह है कि  इसकी बेसिक जानकारी होने के बाद यह हमारे लिए पूरी तरह से सेल्फ लर्निंग बन जाती है। यानि कि यदि आपकी इसमें रुचि है और आप इस तकनीक को समय दे रहे हैं तो अपनी रुचि के अनुसार इससे कई चीजे सीखी जा सकती हैं। हम आज यहां एक ऐसे वेबसाइट की बात करेंगे, जिसपर यदि समय दिया जाए, तो कुछ ही महीनों के भीतर एक अच्छा वेबसाइट डवलपर बना जा सकता है। यह वेबसाइट मुफ्त है और यह किसी पर्सनल ट्यूटर की तरह ही ट्रेनिंग देती है। यानि, मंहगे ट्यूशन्स से मुक्ति और सीखने के बाद घर बैठकर हाथ में रोजगार का एक अच्छा अवसर। 

'डब्ल्यू थ्री स्कूल्स' नाम की यह वेबसाइट लर्नर्स को एचटीएमएल, जावा, एक्सएमएल जैसे कई कंप्यूटर लैंग्वेज लर्निंग टूल उपलब्ध कराती है। यहां आपको तीन सेक्शन्स- ट्यूटोरियल, ट्राय इट यॉरसेल्फ और रिफरेंसेज के आधार पर ट्रेनिंग दी जाती है। इसमें होमपेज पर बायीं ओर विषयों की सूची दी गई है। इस वेबसाइट की खासियत यह है कि यहां आप 'ट्राय इट यॉरसेल्फ' सेक्शन में ऑनलाइन एक्सरसाइज भी कर सकते हैं। होमपेज पर नीचे, क्विज और एग्जामपल्स का लाभ भी लिया जा सकता है। बच्चों और प्रोफेशनल्स दोनों के लिए ही यह वेबसाइट मददगार है क्योंकि अपनी सुविधानुसार आप जब चाहें तब यहां ई-लर्निंग कर सकते हैं।

पता है - www.w3schools.com

राजस्थान पत्रिका के एजुकेशन सप्लीमेंट ' मी नेक्स्ट ' में दिनांक - 18 दिसम्बर 2011  को प्रकाशित। 

Monday, December 12, 2011

अनुवाद की दुनिया


आज के  इस दौर में अंग्रेजी और हिन्दी भाषा की जानकारी होना सामान्य के साथ ही जरूरी भी है। हिन्दी जहां हमारी राजभाषा है, वहीं अंग्रेजी के बिना इस ग्लोबल जगत में आगे बढ़ पाना मुश्किल है। ज्यादा से ज्यादा भाषाओं की जानकारी होने से आपकी पहुंच उन भाषा के साहित्य औरसंस्कृति तक भी बनती है। आज यदि आपको हिंदी और अंग्रेजी दोनो भाषाओं की अच्छी जानकारी  है, तो आपकी यह खूबी आपको बेहतर करियर ऑप्शन भी दिलाती है। आज हर क्षेत्र में अंग्रेजी-हिन्दी अनुवादक के काम को सराहा जाता है। अनुवाद में रुचि होने पर आप घर बैठे भी आसानी से पैसे कमा सकते हैं। एक अच्छे अनुवादक के लिए सबसे जरूरी है समय के साथ अंग्रेजी-हिन्दी अनुवाद की दुनिया में आए बदलाव, चलन और बहसों की जानकारी होना और उस आधार पे खुद को अपडेट रखना। ब्लॉग ‘अनुवाद की दुनिया’ आपको इन्हीं जानकारियों के लिए अपनी ओर खींचता है। ब्लॉग पर आपको अंगे्रजी के शब्दों को देवनागरी लिपि में लिखने की प्रचलित विधि और चली आ रही अशुद्धियों में सुधार की जानकारी मिलती है। यह ब्लॉग आपको अंग्रेजी-हिन्दी अनुवाद में मदद के लिए ऑनलाइन लिंक्स उपलब्ध कराता है। इसके अलावा इस ब्लॉग के माध्यम से अपको हिन्दी भाषा के नए शब्द और नई बहसों से भी रूबरू होने का मौका मिलता है। 

ब्लॉग का पता है- anuvaadkiduniya.blogspot.com

राजस्थान पत्रिका के एजुकेशन सप्लीमेंट ' मी नेक्स्ट ' में दिनांक -10 दिसम्बर 2011  को प्रकाशित। 

Saturday, December 10, 2011

व्हाट इज नेक्स्ट डूड !


टेक्नोलॉजी और गैजेट्स में इंट्रेस्ट रखने वाले हर यूजर की जुबां पर एक आम सवाल है- 'व्हाट इज नेक्स्ट'। पीसी, लैपटॉप, स्मार्टफोन से लेकर सोशल साइट्स, ब्लॉगिंग और क्रिएटिव वेबसाइट्स ने आज के यूथ को एक  वर्चुअल वर्ल्ड दिया है। एक ऐसा वर्ल्ड जहां हर पल कुछ नया, बेहतर और इंट्रेस्टिंग होता रहता है। ऐसे में सबसे पहले नई जानकारियों तक अपनी पहुंच बनाना, गजेट्स के लॉन्चिग से पहले उसके फीचर्स को इवेल्युएट करना और नए आपरेटिंग ट्रिक्स को  जानना अपने आप में इंट्रेस्टिंग काम है। जी हां, हमारा आज का ब्लॉग 'ऑनलाइन इंस्पिरेशन' कुछ ऐसी ही जानकारियों से जुड़ा हुआ है या शायद उससे कहीं ज्यादा!

इस ब्लॉग के होम पेज पर आपको हर दो-तीन दिन में अपडेशन के साथ लेटेस्ट पीसी ट्रेंड, साफ्टवेयर डाउनलोड, गैजेट्स रिव्यू के साथ ही रोचक टेक्निकल न्यूज मिल जाएंगे। होमपेज के राइट और लेफ्ट साइड में ऊपर से नीचे की ओर अलग-अलग सेक्शन्स में फ्री सॉफ्टवेयर डाउनलोड, कंप्यूटर और इंटरनेट सिक्यूरिटी टिप्स से लेकर ऑनलाइन ऑफर्स, ब्लॉगर्स कॉर्नर, फेसबुक टिप्स, मोबाइल सॉफ्टवेयर एंड ट्रिक्स जैसे कई लेटेस्ट यूजफूल आर्टिकल्स उपलब्ध हैं। सास बात यह है कि यहां आपको हर टिप्स एंड ट्रिक्स को स्टेप वाइज पिक्चर्स के साथ बताया गया है, जिससे यह यूजर्स के लिए ईजी अंडरस्टैंडेबल है।

उम्मीद है यहां आपको आपके 'व्हाट इज नेक्स्ट' का जवाब मिल जाएगा!! 
ब्लॉग का पता है- skvnet.blogspot.com


राजस्थान पत्रिका के एजुकेशन सप्लीमेंट ' मी नेक्स्ट ' में दिनांक - 3 दिसम्बर 2011  को प्रकाशित। 

Monday, September 5, 2011

भ्रष्टाचार, सदाचार और आंदोलन


चार लाख लोग। दो सौ शहर। बारह दिन। एक नेता और एक नारा “एक-दो-तीन-चार नहीं सहेंगे भ्रष्टाचार”। भ्रष्टाचार के विरोध में जनयुद्ध रुपी अन्ना हजारे के अनशन को खत्म हुए लगभग एक सप्ताह हो गया है।आजादी के बाद (वाया जेपी आंदोलन) यह एक ऐसी ऐतिहासिक लड़ाई रही, जिसने सदन में बैठे लोगों को यह बखूबी समझा दिया कि जनता से ही देश और उनका अस्तित्व है, न की देश और उनसे, जनता का। आजादी के बाद यूं तो कई छोटे-मोटे आंदोलन हुए, लेकिन ऐसा जनसमर्थन और स्वस्फूर्त उद्गार शायद ही देखने को मिला। इसमें कोई शक नहीं है कि भ्रष्टाचार ने हमारे समाज और इसके तंत्र को ऊपर से नीचे तक अपनी चपेट में लिया हुआ है। भ्रष्टाचार से तंग जनता ने इस आंदोलन में अपनी ताकत को पहचाना है। यही कारण है कि युवाओं से लेकर बूढों तक सब ने इस आंदोलन में शिरकत की। यह आंदोलन अपने मकसद में कितना सफल हुआ और कितना नहीं यह तय करने में अभी समय लगेगा, क्योंकि लोकपाल विधेयक का शीतकालीन सत्र से पहले पारित होने के कोई आसार फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं, लेकिन इस आन्दोलन ने हमें एक ऐसा विषय दिया है जिसपर विचार करना जरुरी हो गया है।
भ्रष्ट आचार, यानि कोई भी ऐसा कृत्य जो अनैतिक हो भ्रष्टाचार है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कुछ भी अनैतिक करना भ्रष्टाचार है, तो ऑटो में बिना मीटर चलवाये बैठना और बस में बिना टिकट लिए कडंक्टर से सस्ते में निपट लेना, क्या भ्रष्टाचार नहीं है? कहने का अर्थ यह कि आज सबसे पहले हमें भ्रष्टाचार को परिभाषित करने की जरुरत है। आन्दोलन के दौरान सड़को पर विरोध में नारे लगाना तो समझ में आता है पर बेखौफ और बेरोकटोक ठाठ से सड़क के नियमों को तोड़ना और फिर भ्रष्टाचार की हाय-हाय करना, खुद को गाली देने जैसा ही जान पड़ता है। ये तो महज् छोटे उदाहरण हैं, यदि खुद के दैनिक क्रियाकलापों पर ही गौर करें तो हम जान पाएंगे कि भ्रष्टाचार कैसे हमारे दिनचर्या में सहज तरीके से फिट हो गया है। स्थिति ऐसी है कि हम यह अंदाजा ही नहीं लगा पाते कि हम कहां और कितने भ्रष्ट हैं।
इस पूरी मंत्रणा के बाद सवालों के घेरे में हम खुद आ जाते हैं कि क्या हम इस तरह एक भ्रष्टाचार मुक्त समाज और तंत्र का निर्माण कर पाएंगे? क्या बिना खुद में परिवर्तन लाए हम सामने वाले से सदाचार की उम्मीद रख सकते हैं? यकीनन नहीं। वस्तुस्थिति ऐसी है कि आंदोलन के दौरान जहां एक ओर हम गांधी जी के आर्दर्शो को सिर-माथे लेकर घूम रहे थें, वहीं दूसरी ओर गांधी जी के “आप भला तो जग भला” कथन की अनसूनी भी कर रहे थें। हम भूल रहे हैं कि यदि स्थितियों में बदलाव लाना है तो हमें स्वयं को भी बदलना होगा। अन्ना के साथ भावनाओं का जुड़ना और समर्थन में जनसैलाब का उमड़ना इसी कारण संभव हो पाया कि अन्ना की छवि एक निःस्वार्थ और ईमानदार नेतृत्वकर्ता की रही है, एक ऐसा नेता जो सामाजिक मकसद के लिए लड़ाई लड़ता आया है और अपनी जान तक देने को तैयार है।
भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है, खुद अन्ना ने भी मंच से कहा कि यह आधी जीत है। मेरी समझ से भ्रष्टाचार के खिलाफ यह लड़ाई तब तक खत्म नहीं हो सकती जबतक की हम खुद से लड़कर, अपने अंदर के भ्रष्टाचार को भी खत्म नहीं कर लेते। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आंदोलन एक शुरुआत है। व्यवस्था तंत्र को सुदृढ और जिम्मेदार बनाने के लिए अनेकों और आंदोलनों की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि हम व्यवस्थागत भ्रष्टाचार के साथ-साथ व्यक्तिगत भ्रष्टाचार को भी खत्म करने का प्रयास करें, ताकि सही मायने में भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल सके। 

Tuesday, August 16, 2011

आज़ादी की खीर


आठ साल के बबलू को उसकी मां सुमिता ने आज अहले सुबह 5 बजे ही जगा दिया है। ना नुकुर करता बबलू अभी और सोना चाहता है। सुमिता उसे याद दिलाती है कि आज 15 अगस्त है। मां की बात सुनते ही बबलू झट से उठ जाता है। उसकी नींद 15 अगस्त का नाम सुनते ही छु-मंतर हो गई है। आधे घंटे में बबलू तैयार होकर मां के साथ अपने छोटे से तंबुनुमा घर से बाहर निकल आता है। बगल के स्कूल में सारें जहां से अच्छा... गीत बज रहा है। बबलू को यह सब बहुत अच्छा लगता है। तभी सामने के घर से जुम्मन चाचा अपने बेटे फारूक के साथ निकलते हैं। चाचा अपने हाथ में थामें झोले को खोलते हैं जिसमें सैकड़ों छोटे-छोटे प्लास्टिक के तीरंगे झंडे हैं।

रोज की जिंदगी से इतर आज का दिन बबलू के लिए खास है। आज उसे ट्रैफिक पर हाथ फैलाने की बजाय लोगों को झंडा बेचना है। वह और उसकी मां पिछले कई दिनों से इस दिन के लिए पैसें जमा कर रहे थें, ताकि झंडे खरीदकर वह उन्हें सडकों पर बेच सके। आज कमाई ज्यादा होगी। बबलू की मां ने आज दोपहर उसे खीर खिलाने का वादा किया है। 

बबलू और उसकी मां अपने घर के पास वाले चौराहे पर ही झंडे लेकर खड़े  हो जाते हैं जबकि चाचा अपने बेटे, जो बबलू से उम्र में 2 साल बड़ा है, के साथ शहर के मुख्य चौराहे पर गए हैं। चाचा हर रोज इसी तरह नयी चीजे लेकर बेचने निकलते हैं। करीब 15 मिनट के इंतजार के बाद सड़क पर हलचल बढ़ जाती है। रंग-बिरंगे और साफ-सुथरे कपड़ों में स्कूली बच्चों का दल प्रभात फेरी के लिए निकल चुका है। सड़क पर भीड़ बढ़ रही है। बबलू दौड़-दौड़कर लोगो को झंडे लेने के लिए प्रलोभित कर रहा है। कई बार पुलिस घेरे के अंदर घुस जाने पर उसे पुलिस वालों ने डंडे भी दिखाए, जिस पर वह हंसता हुआ वहां से भाग गया। इधर सुमिता का ध्यान झंडा बेचने के साथ ही बबलू पर लगा हुआ है। वह हर पल उसपर नजर बनाये हुई है। वह कई बार बबलू को डांटती भी है। वह कहती है, ‘क्या पता सड़क पर बेखबर दौड़ती गाडिय़ों से कहीं कुछ अनहोनी ना हो जाए।’

करीब साढ़े तीन घंटे बाद, सड़क पर भीड़ अब कम हो चली है। सुमिता, बबलू से कहती है कि चल अब शायद कोई नहीं खरीदने वाला, घर चलते हैं। बबलू के हाथ में एक झंडा बचा हुआ है वह उसे बेच कर जाने की  जिद कर रहा है। मां उसके जिद के आगे लाचार है, तभी सामने से एक युवा दंपत्ति की गाड़ी ट्रैफिक पर रूकती है। बबलू अपनी मासूम आवाज में झंडे खरीदने को कहता है। इस तरह उसका आखिरी झंडा भी बिक गया। वह कूदते हुए मां को आखिरी झंडे के पैसे दिखाता है और घर चलने के लिए कहता है।

घर पर चाचा और फारूक अच्छी कमाई होने को ले उत्साहित हैं। मां खीर बना रही है। बबलू और फारूक बचे हुए कुछ झंडों से आजादी-आजादी खेल रहे हैं। दोनों सारे जहां से अच्छा... टूटे-फूटे लफ्जों में गा रहे हैं। खीर बन गया है। सुमिता बबलू को खीर परोसती है। खीर की खुशबु से बबलू का चेहरा खिला हुआ है। सुमिता खीर खा रहे बबलू को एकटक देख रही है। अचानक उसकी आंखों से आंसूओं की धारा बह निकलती है। उसका मन आज वापस गांव जाने को कर रहा है। 

आज सुबह स्कूली बच्चों को देख सुमिता को एक साल पहले गांव में अपने जीवन की याद आ गयी, जब वह 15 अगस्त को सुबह उठ बबलू को पड़ोस के सरकरी स्कूल के लिए तैयार करती थी। पर आज कुछ भी वैसा नहीं है। गांव के जिस जमीन पर वह काम करती थी उसे सरकार ने अधिग्रहित कर लिया है। वहां अब बड़े-बड़े मकान बनने हैं। उसका पति उन्हें छोड़ विदेश कमाने गया है। दो साल हो गए, उसकी कोई खोज-खबर नहीं है। गांव वाले कहते हैं कि वो किसी दुर्घटना में मर गया है, लेकिन सुमिता यह मानने को तैयार नहीं है। गांव वालों के उलाहने से परेशान सुमिता, बबलू को ले पास के शहर आ गई है... काफी कोशिशों के बाद भी काम न मिल पाने के कारण वह सड़को पर           हाथ फैलाने के लिए मजबूर है।....

बबलू के आवाज लगाने पर सुमिता का ध्यान टूटा। बबलू खीर खत्म कर चुका है। वह मां से उसके रोने की वजह पूछता है। सुमिता कुछ  नहीं बोलती है, बस अपने आंचल से आंसु पोंछते हुए बबलू को अपने सीने से लगा लेती है। मां के आंचल की गर्मी में बबलू अब सो चुका है और सुमिता दूर कहीं शून्य को निहार रही है।....


जनसत्ता समाचार पत्र के "समांतर" स्तंभ में दिनांक- 06 सितम्बर 2011 को प्रकाशित