Wednesday, September 11, 2013

पहली और शायद आखिरी मुलाकात!


 जून की उस रात में तुमसे मेरी वह पहली मुलाकात थी और शायद आखिरी भी! मैं रोज की तरह ऑफिस  से घर लौट रहा था। सच कहूं तो पहली बार जब तुमने मुझे टोका था तो थोड़ा संकोच हुआ था, लेकिन उस 20 मिनट ने तुम और तुम्हारी बिरादरी से मेरे सारे संकोच दूर कर दिए। मैं आज भी तुम्हारे बारे में सोचता हूं तो पहले पहल यही ख्याल आता है कि तुम्हारा असली नाम क्या होगा। मेरे कई बार पूछने के बावजूद तुमने बताया भी नहीं था। तुमने मुस्कुरा कर बस इतना कहा था, 'कुछ भी कह लो रे, हम जैसों के नाम तो कपड़ों के रंग से साथ बदलते है।' वैसे मेरी इच्छा थी कि तुम्हे 'दुर्गा' नाम दूं, क्योंकि वह शक्ति का प्रतीक है।

मैंने पहले भी तुम्हें वहां देखा था। हां, वह तुम नहीं थी, लेकिन वह तुम ही थी। मेरी नजर में तुम एक प्रतीक हो उस समाज कि जिससे हम असामाजिक चिढते हैं। मुझे तब उस तथाकथित बुद्धिजीवी टाइप दिखने वाले वृद्ध की अज्ञानता पर तरस आया था जब उसने तुम्हें तिरस्कार भरी नजरों से देखा और मुझसे कहा कि इन ’हिजड़ों’ से दूर रहो। तुमने अपने चिर-परिचित अंदाज में उसे देखकर बस ताली बजा दी थी।

तुमने बताया था कि तुम रोज दिन में स्नान कर एक घंटे पूजा करती हो। इसलिए नहीं कि तुम्हारी ईश्वर में आस्था है बल्कि इसलिए कि अगले जन्म में तुम्हें फिर से इस जीवन की तरह सजा न मिले। मुझे इस बात का दुख हुआ था कि तुम यह मान बैठी हो कि तुमने पिछले जन्म में कुछ पाप किए थे, इसलिए ईश्वर ने तुम्हें ऐसा बनाया। मैंने इस पर तुम्हें टोका भी था, लेकिन तुम्हारे लिए मेरे पास तर्क नहीं थे। सच कहूं तो मैं यह सोचने मात्र से सिहर जाता हूं कि आठ साल की उम्र में मुझे मेरे समाज से लेकर मेरे अपने तक स्वीकारने से इन्कार कर दें। मेरे बेहतर कल के ख्वाब 300 रुपये की मामूली रकम पर अंधेरी चिमनी में झोक दिए जाए और 13 साल की उम्र से मेरा मन, मेरा शरीर और मेरी आत्मा रोज कई मर्तबा वासना के भार तले कुचली जाए। यह सब भी इसलिए कि मेरे साथ उसने एक भद्दा मजाक किया, जो खुद को भगवान कहता है।

तुम्हारे जिस बेबाक बर्ताव से लोग घृणा करते हैं, मुझे उस रात वही एक मात्र व्यवहारिक बर्ताव लग रहा था। तुमने जिस तरह पुलिस वाले के टोकने पर उसे चिढाने के लिए अपनी स्कर्ट उपर की थी और तुम्हारी संगी ने उसपर ताली ठोकी थी। या फिर उस वृद्ध से तुम्हारे बर्ताव पर ही मुझे हंसी नहीं आई थी। मैं यही सोच रहा था कि तुम ठीक ही कर रही हो। भला समाज ने तुम्हें ऐसा क्या दिया है कि तुम उसकी संस्कृति को पूजो। तुम्हारा वह सवाल भी मुझे चुप कर देने वाला ही था कि क्या रोजी-रोटी के लिए इस तथाकथित सभ्य समाज का कोई भी कोरपोरेट संस्थान तुम्हें अपने यहां काम देगा? कागजों और वक्तव्यों में भले ही ऐसा संभव भी हो, लेकिन व्यवहारिक तौर पर क्या कोई तुम्हें अपनी बराबरी में कुर्सी पर बैठकर काम करने देगा? मैं तुम्हारी बात को काटना चाहता था, लेकिन तुम्हारे तर्क मेरे तर्कों से कहीं ज्यादा व्यवहारिक जान पड़ रहे थे।

मैं आज भी कई बार उस लाल गाड़ी को कोसता हूं, जिसने महज 20 मिनट की इस बातचीत के बाद कुछ सौ रुपये के एवज में तुम्हें मुझसे दूर कर दिया। कितनी बाते अनकही रह गईं हमारे बीच। जानता हूं तुम शायद ही कभी मिलोगी....

Saturday, September 22, 2012

सिनेमा का 'सलमान जॉनर'


'एक था टाइगर',  पिछले कुछ समय में आई 'सलमान जॉनर' या यूं कहें कि 'सलमानदा फिल्मों' से अलग है। फिल्म सलमान खान की दमदार एंट्री के बाद अगले ही पल से स्लो हो जाती है। सलमान से एक्टिंग की अपेक्षा नहीं रहती, लेकिन आप उनसे भरपूर मनोरंजन की उम्मीद जरूर रखते हैं। फिल्म आपको शुरू से निराश करती है। फिल्म के दौरान आप यही सोचते हैं कि अब कुछ ऐसा होगा जो रोमांच लाएगा, लेकिन यह इंतजार लंबा खिचता है। हालांकि इस बीच सलमान अपने अंदाज में हास्य के पुट जरूर जोड़ते हैं जो गुदगुदाती तो है, लेकिन हंसी को ज्यादा देर तक बनाए रखने में सफल नहीं होती। इस तरह फिल्म के दौरान आप यह निर्णय करने लगते हैं कि फिल्म पकाउ है और बोर कर रही है। लेकिन तभी फिल्म बदलती है। फिल्म का 'सलमान जॉनर' में प्रवेश होता है। यहां से कहानी, निर्देशन, एक्शन और 'सलमानिया अंदाज' आपको अंत तक बंधे रखती है। अंत में फिल्म अपने बहुचर्चित सॉन्ग ट्रैक 'माशाल्लाह' से खुशनुमा अंदाज में खत्म होती है। फैंस गीत गुनगुनाते बाहर निकलते हैं और पूछने पर यही बताते हैं कि फिल्म अच्छी लगी। फिल्म के बोरियत पक्ष पर सवाल करने पर आपको सीधा जबाव मिलता है, 'सलमान हैं, तो फिल्म जबदस्त है।'

15 अगस्त 2003 को सतीश कौशिक निर्देशित और सलमान खान आभिनित फिल्म 'तेरे नाम' रीलीज हुई थी। इस फिल्म से रूपहले परदे पर पहले पारिवारिक और फिर दिलफेंक अंदाज वाला 'प्रेम' कॉलेज के रौबदार दादा सरीखे 'राधेमोहन' में परिणत हुआ था। राधे का किरदार रौबदार जरूर हो, लेकिन उसका प्रेम गहरा था। यानी 'प्रेम' की छवि यहां भी थी। कहने की जरूरत नहीं कि इस फिल्म ने उस समय सलमान के रूक से गए कॅरियर को नया आयाम दिया था। इस फिल्म से न सिर्फ सलमान के स्टारडम की वापसी हुई थी, बल्कि इस फिल्म में सलमान के अभिनय पक्ष को भी खासी सराहना भी मिली थी।

ठीक नौ साल बाद 15 अगस्त 2012 को कबीर खान निर्देशित फिल्म 'एक था टाइगर' रीलीज हुई। तारीख भले ही मेल खा रही हो, लेकिन समय और परिस्थितियां बदल चुकी हैं। आज सलमान स्टारडम के उस मुकाम पर पहुंच गए हैं, जहां उन्हें किसी 'तेरे नाम' की जरूरत नहीं है। 2009 में आई 'वॉन्टेड' और 2011 में 'दबंग', 'रेडी' और 'बॉडीगार्ड' जैसी फिल्मों ने भारतीय सिनेमाई संसार को पहली बार, पहले ही दिन से अकूत कमाई का रास्ता दिखाया। खास बात यह रही कि इस तरह की अप्रत्याशित सफलता के बावजूद इनमें से किसी भी फिल्म ने सलमान के अभिनेता-पक्ष को कोई विस्तार नहीं दिया। इतना ही नहीं इन फिल्मों में न तो कुछ नया था और न ही कुछ विषेष। फिर था क्या? यदि इस सवाल का जवाब ढूँढने निकले तो इन चारों में एक ही समानता थी और वह है खुद 'सलमान'। यानी 1989 में परदे पर प्रेम करने, बांटने और बाद के दिनों में प्रेम के गुरू तक बन जाने वाले सलमान ने 23 वर्षों के सिनेमाई सफर में अपने चाहने वालों के दिल में ऐसा 'प्रेम' जगाया कि सब 'प्रेम' में अंधे हो गए। एक ऐसा अंधा प्रेम जिसने परदे से कहानी, गीत-संगीत, निर्देशन जैसे तमाम पक्षों को धता बताते हुए सिनेमा का एक नया जॉनर ही विकसित कर दिया। आज यह जॉनर न सिर्फ फिल्म के सफलता की गारंटी बन गया है, बल्कि यह हर बार सफलता और कमाई के नए रिकॉर्ड बनाता है।

'एक था टाइगर' ने पहले ही दिन लगभग 32 करोड़ की कमाई की जो अब तक पहले दिन की सबसे ज्यादा कमाई है। फिल्म की एडवांस बुकिंग की कमाई साढ़े पांच करोड़ रूपए है जो एडवांस बुकिंग से कमाई का रिकॉर्ड है। इसके अलावा भारतीय सिनेमाई संसार की यह पहली फिल्म है, जिसे पहले दिन मल्टीप्लैक्स समेत तमाम स्क्रीन्स पर 95 से 100 फीसदी दर्शक मिले। यानी रिकॉर्ड और आंकड़ों का अंबार। सलमान इस साल दिसंबर में 'दबंग-2' और अगले ईद पर सोहेल खान निर्देशित 'शेरखान' लेकर आ रहे हैं, जिसे लेकर अभी से रिकॉर्ड के कयास लगने शुरू हो गएँ हैं।

ऐसे में फिलवक्त यही कहा जा सकता है कि सलमान भारतीय सिनेमा जगत के ऐसे स्टार हैं, जिनकी लाख आलोचना के बाद भी उनकी रियासत यानी उनके फैंस पर कोई असर नहीं होता। न तो सलमान और न ही उनके फैंस को फिल्म के हिट या पिट जाने की फिक्र होती है। इस नयी 'सलमान जॉनर' की फिल्मों को भले ही आलोचक सिरे से नकार रहे हों, लेकिन यह भी सच है कि उनकी पिछली फिल्मों ने सिनेमाई मनोरंजन की नई परिभाषा ही गढ़ दी है। ऐसे में यह भी संभव है कि सिनेमा के स्वर्णीम इतिहास के लेखन में आलोचक 'सलमान' शब्द से ही कन्नी काट लें, लेकिन ऐसा करना सिनेमा के उस खास दर्शक वर्ग पर आघात ही होगा, जो महीने के पैसे बचाकर अपने हीरो को बड़े परदे पर देखने की हसरत रखता है। कल को सलमान भले ही राजेश खन्ना, दिलीप कुमार, देवआनंद या अमिताभ बच्चन की तरह एक अभिनेता के रूप में न याद किए जाएं, लेकिन बतौर ट्रेंड सेटर और एक नए जॉनर को विकसित करने के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। 

एक कटु सत्य यह भी है कि सलमान की यह आंधी ज्यादा समय तक बॉक्स ऑफिस को बांध नहीं पाएगी, लेकिन यह जब तक चलेगी अपने मदमस्त चाल में रहेगी, यह तय है। ऐसे में दो ही बातें संभव है- एक की आप उनकी आलोचना करें और इस आंधी रूपी नशे के उतरने का इंतजार करें या दूसरा यह कि सिनेमा के इस नए मनोरंजन विधा का आनंद लें। खुद का मनोरंजन करें, जो सिनेमा के  बहूदेश्यों में से एक है। यदि 'सलमान जॉनर' या 'सलमानिया अंदाज' में कहें, तो 'जस्ट चिलैक्स....'



(दिल्ली से प्रकाशित होने वाली फिल्म पत्रिका 'सतरंगी संसार' के सितम्बर अंक में प्रकाशित)

Sunday, August 26, 2012

बंदी, उत्सव और हलवा डे


पिछले दिनों 15 अगस्त के लिए एक सॉफ्ट स्टोरी की दरकार थी, ऐसे में जयपुर के केन्द्रीय कारागृह जाना हुआ। किसी खास अवसर पर जेल की यह मेरी पहली यात्रा थी। इससे पहले स्कूल के दिनों में जेल देखने के लिए शौकिया तौर पर मंडल कारा, मधेपुरा भी जाना हुआ था। बहरहाल, अबकी जेल यात्रा से लौटकर यह स्टोरी तैयार की, जिसे 15 अगस्त के जस्ट जयपुर अंक में लीड स्टोरी बनाई गई। यह अलग बात है कि इस दौरान विज्ञापन की बाढ़ में इस  स्टोरी को भी एक अलग-सी चाहरदीवारी में सिमटना पड़ा। पूरी स्टोरी यहां साझा कर रहा हूं।

केंद्रीय कारागृह, जयपुर 
जेल, यह शब्द सुनते ही मन में एक अलग-सी धारणा बन जाती है। ऐसी जैसे इस चाहरदीवारी के अंदर कुछ भी अच्छा न होगा। कैद होगी, घुटन होगी, आंसू होंगे, सख्त कानून होंगे और न जाने क्या-क्या। लेकिन शहर के केन्द्रीय कारागृह में कुछ भी ऐसा नहीं है। हमारे सिनेमाई संसार ने भले ही परदे पर हमें जेल का ऐसा ही स्वरूप दिखाया, लेकिन यहां अंदर का माहौल किसी खुशहाल परिवार जैसा लगा। परिवार नहीं, तो कम से इसने बचपन के दिनों में स्कूली कैम्प की याद जरूर दिला दी। जहां हफ्तों तक अनुशासन और शिक्षकों की निगरानी में हम कुछ सीखने जाते थे। शिक्षा यहां भी मिलती है- भविष्य को बेहतर और अनुशासित बनाने की।
        यूं तो बंदियों के लिए इस चाहरदीवारी की हर सुबह सूर्योदय के साथ शुरू और सूर्यास्त के साथ बैरकों में बंद हो जाती है, लेकिन आज 15 अगस्त का दिन खास है। आज देश स्वतंत्रा की 65वीं वर्षगाठ मना रहा है। शरीर भले ही चाहरदीवारी में कैद हो, लेकिन मन में स्वतंत्र नागरिक की भावना और चेहरे पर स्वंत्रता का उत्साह इन बंदियों पर पिछले कई दिनों से दिख रहा है। 

खास है ये सुबह
वर्तमान में केन्द्रीय कारा के लगभग 2200 कैदियों के लिए 15 अगस्त की सुबह अन्य दिनों से बिल्कुल अलग होगी। वे इस दिन की तैयारी पिछले कई हफ्तों से कर रहे हैं। झंडोत्तलन, राष्ट्रगान, देशभक्ति से ओत-प्रोत संवादो के साथ आज का पूरा दिन नाटक और कुछ अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम रहेगा। 

खूब जमेगा रंग
कारागृह में एक बड़ा हॉल है, जहां लगभग 700-800 लोगों के बैठने का स्थान है। सामने एक स्टेज है, जहां आज सांस्कृतिक कार्यक्रमों का दौर चलेगा। जेल का सांस्कृतिक विभाग और उससे जुड़े साथी कई दिनों से बंदियों के साथ मिलकर इस दिन की तैयारी कर रहे हैं। प्रशासन की ओर से उन्हें इसके लिए म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स, डेकोरेशन के साथ ही राजस्थान के पारंपरिक लिबास भी उपलब्ध करवाए गए हैं। कारागार के उप-अधीक्षक प्रमोद शर्मा बताते हैं कि यहां बंदियो की रचनात्मक अभिव्यक्ति  देखने को मिलती है, जो उनके प्रति सामाजिक धारणा को बदल कर रख देती है। 

स्पेशल है 'हलवा डे'
आज कारागृह में बंदियों समेत सभी को कुछ मीठा खाने को मिलेगा। साल में 26 जनवरी, होली, 15 अगस्त, दीवाली और ईद में यहां कुछ मीठा खाने का रिवाज है।  इसके तहत अंग्रेजों के समय से हलवा परोसने की प्रथा है। ऐसे में बंदी समेत जेल अधिकारियों को हलवे की मीठी सुगंध का खास इंतजार है। 

बड़े परदे का रोमांच
यूं तो कारागृह में टीवी पर फिल्म दिखाई जाती हैं, लेकिन आज का दिन विशेष है। हाल ही यहां बंदियों के लिए प्रोजेक्टर लगवाया गया है। जिस पर आज 'क्रांति' और 'शहीद' जैसी देशभक्ति फिल्में दिखाई जानी हैं। यानी बड़े परदे के साथ मंनोरंजन भी बड़ा होगा। 

ये भी बांटते हैं खुशियां
बंदियों के इस दिन को खास बनाने के लिए शहर के कई स्कूल और स्वयंसेवी संस्थाएं 15 अगस्त और इसके आस-पास जेल में कार्यक्रम का आयोजन करती हैं। इस दौरान मिठाइयों का दौर भी चलता है। 

सेलिब्रेशन भुलाता है गम
कारागृह के उप-अधीक्षक प्रमोद शर्मा बताते हैं कि  समाज से अलग समझने पर कैदियों को काफी ठेस पहुंचती है। जब कोई अपना उनसे मिलने नहीं आता, तो उनको अलगाव महसूस होता है। लेकिन जब सभी कैदी मिलकर स्वतंत्रता दिवस या अन्य उत्सव मनाते हैं, तो उनको यह कमी नहीं खलती और वे पूरा दिन हंसी-खुशी एक पारिवारिक आयोजन की तरह एकजुट होकर मनाते हैं। 

जज्बा देखते ही बनता है
कारागृह अधीक्षक ओटाराम  रोहिन ने बताया कि इस दिन कैदियों में अलग तरह का उत्साह देखने को मिलता है। भले ही उनके चेहरों पर आम दिनों में परिवार की याद और भविष्य की सोच की रेखाएं दिखती हों, लेकिन इस दिन चेहरे में रौनक दिखती है। वे कहते हैं कि  हम एक परिवार हैं और परिवार के साथ खुशियां बांटना किसे अच्छा नहीं लगता।   


(इस 'जेल यात्रा' के दौरान सहयोग के लिए सहकर्मी कंचन अरोड़ा जी का धन्यवाद।)  

Tuesday, January 24, 2012

यहां भी है रोचकता


हम में से कई साथी इस बात पर सहमत हो सकते हैं कि विज्ञान, विषय के तौर पर थोड़ा कम रोचक है। इसमें साहित्य या अन्य कला संबंधी विषयों की तरह कथा-कहानियों और बांध कर रखने वाले रोचक तत्वों की कमी है। लेकिन नहीं। असल में विज्ञान भी उतना ही रोचक है, जितना कि कला। दरअसल मूल समस्या हमारे पढऩे के तरीके में है। यदि हम विज्ञान और उससे जुड़ी खोजों की कहानियों को पढ़ें, तो यकीन मानिए ये आपको कला से भी ज्यादा रोमांचित करती हैं। हममें से कई साथियों को पहली बार इस बात पर हंसी आई होगी कि न्यूटन को गुरुत्वाकर्षण बल का एहसास सिर पर फल के गिरने से हुआ या यह कि आर्किमिडीज ने स्नान के समय जब खुद को पानी में हल्का महसूस किया, तो अपनी इस खोज पर वे बिना कपड़ों के ही स्नानघर से 'यूरेका यूरेका' चिल्लाते हुए दौड़ पड़े थे। हाल ही एक अध्ययन रिपोर्ट ने भी देश में विज्ञान की पढ़ाई और उसके तरीकों पर सवालिया निशान लगाया है, जिसके बाद इसे रोचकता से पढ़ाने और शिक्षा प्रणाली में बदलाव की वकालत की जा रही है। विज्ञान में रोचकता और बांध कर रखने वाली इसी कड़ी की खोज में भटकते हुए मैं एक वेब साइट पर पहुंचा। साइट का नाम है- 'टुडे इन साइंस हिस्ट्री'

यह साइट अपने नाम के अनुरूप विज्ञान जगत के इतिहास की तिथिवार कहानियां सुनाती है। यदि आप पिछली किसी तिथि पर हुई खोजों, विज्ञान जगत में जन्म और मृत्यु जैसी जानकारी लेना चाहें, तो कैलेंडर में फेरबदल कर सकते हैं। साइट के बाईं ओर मेन्यू में साइंस कोट्स का ऑप्शन है, जहां साइंटिस्ट्स के कोटेशंस ढूंढे जा सकते हैं। साइंस स्टोरीज और कैमेस्ट्री स्टोरीज सेक्शन में आविष्कारों की रोचक कहानियों को पढऩे का मौका मिलता है। आशा है, विज्ञान को रोचक नहीं मानने वाले साथियों को यहां कुछ रोचक तथ्य मिल जाएंगे।


साइट का पता है-

राजस्थान पत्रिका के एजुकेशन सप्लीमेंट ' मी नेक्स्ट ' में दिनांक -22 जनवरी 2012  को प्रकाशित। 

यादें याद आती हैं...

समय जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, अपने पीछे यादें छोड़ जाता है। ये यादें कभी शिकायत, कभी नगमें तो कभी बातों के रूप में सामने आती हैं। और बात जब नगमों, बातों, शिकवों और वादों की हो, तो बरबस ही ध्यान उन रेडियो कार्यक्रमों पर चला जाता है, जिसने हमें अपनों से इसे साझा करने का मंच दिया। आज भले ही रेडियो का स्वरूप बदल गया है और यह बहुत हद तक एफएम चैनलों पर गीतों और विज्ञापनों तक सिमट गया है, लेकिन इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि पहले-पहल रेडियो ने ही हमें खबरों से लेकर मनोरंजन और दूर किसी अपने से यादों और बातों को साझा करना सिखाया। रेडियो से संबंधित इन्हीं यादों, बातों और गिले-शिकवों को साझा करने को कुछ रेडियोकर्मियों ने नाम दिया है- 'रेडियोनामा'।

इस ब्लॉग ने अपने साथ एक पंच लाइन जोड़ रखी है 'बातें रेडियो की... यादें आपकी', जो अपने आप में इस ब्लॉग पर उपलब्ध लेखों की बानगी पेश करता है। यह ब्लॉग इस मायने में मजेदार है कि यहां रेडियो से जुड़े कई जानी-मानी आवाजों को पढऩे का मौका मिलता है। यहां रेडियो स्टूडियो के  कई अनछुए पहलुओं को शब्दों में इस तरह पिरोया गया है कि क्षणभर के लिए ऐसा एहसास होता है मानों हम वहीं उनके साथ रेडियो स्टूडियो में मौजूद हों। एक ऐसे ही याद को साझा करते हुए एक रेडियोकर्मी लिखते हैं कि जब जगजीत सिंह की मृत्यु की खबर आई तो उनकी आंखों में आंसू थे, बावजूद इसके उन्हें यह खबर समाचारी लहजे में श्रोताओं तक पहुंचानी थी।

बहरहाल, यह ब्लॉग हमें भी रेडियो से जुड़ी अपनी यादें साझा करने का मौका देता है। शर्त बस इतनी है कि हम अपनी बात हिंदी में कहें। यहां हमें रेडियो जगत की जानी-मानी हस्तियों के साक्षात्कार को पढऩे और रेडियो जगत की बहसों से रूबरू होने का मौका मिलता है।


ब्लॉग का पता है-

राजस्थान पत्रिका के एजुकेशन सप्लीमेंट ' मी नेक्स्ट ' में दिनांक -15 जनवरी 2012  को प्रकाशित। 

Wednesday, January 11, 2012

ऑनलाइन रीडिंग जोन

न्यू ईयर सेलिब्रेशन खत्म हो चुका है। नई योजनाओं, नए रेजोल्यूशंस, नए सपनों और नई अपेक्षाओं के साथ नए साल की शुरुआत हो चुकी है। हमारे कॉलेज गोइंग साथियों की क्लासेज भी शुरू हो चुकी हैं। यानि अब मस्ती वाले माहौल और दोस्तों से दूर किताबों से दोस्ती करने का समय आ गया है। बात जब दोस्ती की हो रही है, तो यह भी सच्चाई है कि किताबों से बेहतर हमारा कोई दोस्त नहीं होता। एक सच यह भी है कि हर समय कोर्स की किताबों में लगे रहना कभी-कभी बोर कर जाता है। ऐसे में लिट्रेचर की किताबें पढऩा एक बेहतर विकल्प हो सकता है। लिट्रेचर की किताबें न सिर्फ हमारा मनोरंजन करती हैं, बल्कि यह हमें जिंदगी को नए तरीके से देखने का नजरीया भी देती हैं। इंटरनेट की दुनिया में ऐसे कई वेबसाइट्स हैं, जो हमें ऑनलाइन रीडिंग जोन उपलब्ध कराते हैं। एक ऐसा ही साइट है 'रीड प्रिंट'।

इस साइट पर इंग्लिश लिट्रेचर में एसेज, फिक्शन, नॉन-फिक्शन, प्ले, पोएट्री और शॉर्ट स्टोरीज सेक्शंस की कई नई और क्लासिकल किताबें उपलब्ध हैं। रुचि के अनुसार किताबों को ढूंढने के लिए यहां इन सेक्शंस के अलावा फेवरिट ऑथर्स और होमपेज पर नीचे की ओर एक बुक गैलेरी के अलावा रीडर्स के रुझान के आधार पर टॉप फाइव बुक्स और ऑथर्स सरीखे लिस्ट भी दिए गए हैं। बुक सलेक्शन कर बुक के इमेज या नाम पर क्लिक करते ही हमें रीड ऑनलाइन, बाय, राइट ए रिव्यू जैसे ऑप्शंस दिए जाते हैं। यहां से रीड ऑनलाइन के ऑप्शन पर क्लिक करते ही हमारे सामने सेलेक्टेड बुक के डिफरेंट चैपटर्स की लिस्ट आ जाती है। यहां से चैप्टर सलेक्ट कर उस चैप्टर के कंटेट को पढ़ा जा सकता है।

होमपेज पर ऑपशन्स की बात करें तो यहां ऑनलाइन बुक्स का सेक्शन है, जो बुक सेलेक्शन में मदद कर सकता है। फाइंड बुक्स में हम की-वर्ड टाइप कर बुक ढूंढ सकते हैं। एक और मजेदार ऑप्शन ब्राउज कोट्स हैं, जहां ऑथर्स या सब्जेक्ट्स के अनुसार फेमस कोटेशन्स को ढूंढा और पढ़ा जा सकता है। 
वेबसाइट का पता है-   
www.readprint.com
राजस्थान पत्रिका के एजुकेशन सप्लीमेंट ' मी नेक्स्ट ' में दिनांक - 08 जनवरी 2012  को प्रकाशित। 

Saturday, January 7, 2012

लेट्स रॉक दिस सीजन

सर्दी का मौसम, फेस्टिव सीजन की उमंग और नए साल का शुभारंभ।  यानि गाने-बजाने और झूमने के लिए एकदम परफेक्ट टाइमिंग। दोस्तों के साथ न्यू ईयर पार्टी और खूब सारी मस्ती। नए साल का यह माहौल ही रेजोल्यूशंस और नई योजनाएं बनाने के लिए रोमांचित करता है। ऐसे में क्यों न इस बार नए साल में कुछ ऐसा सीखा जाए, जो रिदमिक और क्रिएटिव तो हो ही साथ ही फुर्सत के पलों में कुछ सुकून भी दे जाए। 'गिटार' !  बताने की जरूरत नहीं कि इस शब्द के उच्चारण मात्र से ही मन के तार झनझना उठते हैं। हम चाहे कितने भी तनाव में क्यों न हों, झनझनाते तारों की सरगम हमें सुकून दे जाती है। यदि यह सब इतना सुकून देने वाला है, तो क्यों न नए साल में कुछ समय गिटार और म्यूजिक को भी दिया जाए। यह न सिर्फ हमारी क्रिएटिविटी को बढ़ाने में सहायक है, बल्कि यदि इसमें महारत हासिल की जाए, तो हम इसे बतौर प्रोफेशन भी अपना सकते हैं। म्यूजिक इंडस्ट्री में एक अच्छे गिटारिस्ट को हमेशा सराहा जाता है। इसके अलावा कुछ साथी मिलकर रॉक बैंड का निर्माण कर लाइव शोज और परफॉर्मेन्स भी दे सकते हैं।

हमारा आज का वेबसाइट 'जैम प्ले' आपको घर बैठे गिटार की टे्रनिंग देता है। यह साइट बिगिनर और पहले से गिटार बजा रहे दोनों तरह के साथियों के लिए लाभदायक है। वेबसाइट पर लेसंस, लाइव परफॉर्मेन्स, टीचर्स आदि के सेक्शंस बने हुए हैं। लेफ्ट और राइट साइड में गिटार, बिगिनर, जॉनर और सांग लेसंंस के ऑप्शंस भी एवेलबल हैं। संबंधित ऑप्शन पर क्लिक करते ही वीडियो की मदद से हमारी ट्रेनिंग शुरू हो जाती है। ध्यान रहे इसके लिए आपके ब्राउजर का फ्लैशप्लेयर अपडेटेड हो, ताकि वीडियो आसानी से प्ले हो जाए। साइट पर 'लेसंस' सेक्शन के अंदर बेसिक, स्टाइल एंड जॉनर, स्किल बिल्डिंग जैसे  कई ऑप्शन दिए गए हैं, जहां से आप इलेक्ट्रिक और एकॉस्टिक गिटार के साथ ही ब्लूज, मेटल, रॉक, क्लासिकल, जैज आदि जॉनर का चयन कर सकते हैं। लेट्स 

वेबसाइट का पता है-  www.jamplay.com

राजस्थान पत्रिका के एजुकेशन सप्लीमेंट ' मी नेक्स्ट ' में दिनांक - 01 जनवरी 2012  को प्रकाशित। 

Monday, December 19, 2011

प्रोग्रामिंग की पाठशाला


कंप्यूटर और इसकी तकनीक की सबसे अच्छी बात यह है कि  इसकी बेसिक जानकारी होने के बाद यह हमारे लिए पूरी तरह से सेल्फ लर्निंग बन जाती है। यानि कि यदि आपकी इसमें रुचि है और आप इस तकनीक को समय दे रहे हैं तो अपनी रुचि के अनुसार इससे कई चीजे सीखी जा सकती हैं। हम आज यहां एक ऐसे वेबसाइट की बात करेंगे, जिसपर यदि समय दिया जाए, तो कुछ ही महीनों के भीतर एक अच्छा वेबसाइट डवलपर बना जा सकता है। यह वेबसाइट मुफ्त है और यह किसी पर्सनल ट्यूटर की तरह ही ट्रेनिंग देती है। यानि, मंहगे ट्यूशन्स से मुक्ति और सीखने के बाद घर बैठकर हाथ में रोजगार का एक अच्छा अवसर। 

'डब्ल्यू थ्री स्कूल्स' नाम की यह वेबसाइट लर्नर्स को एचटीएमएल, जावा, एक्सएमएल जैसे कई कंप्यूटर लैंग्वेज लर्निंग टूल उपलब्ध कराती है। यहां आपको तीन सेक्शन्स- ट्यूटोरियल, ट्राय इट यॉरसेल्फ और रिफरेंसेज के आधार पर ट्रेनिंग दी जाती है। इसमें होमपेज पर बायीं ओर विषयों की सूची दी गई है। इस वेबसाइट की खासियत यह है कि यहां आप 'ट्राय इट यॉरसेल्फ' सेक्शन में ऑनलाइन एक्सरसाइज भी कर सकते हैं। होमपेज पर नीचे, क्विज और एग्जामपल्स का लाभ भी लिया जा सकता है। बच्चों और प्रोफेशनल्स दोनों के लिए ही यह वेबसाइट मददगार है क्योंकि अपनी सुविधानुसार आप जब चाहें तब यहां ई-लर्निंग कर सकते हैं।

पता है - www.w3schools.com

राजस्थान पत्रिका के एजुकेशन सप्लीमेंट ' मी नेक्स्ट ' में दिनांक - 18 दिसम्बर 2011  को प्रकाशित। 

Monday, December 12, 2011

अनुवाद की दुनिया


आज के  इस दौर में अंग्रेजी और हिन्दी भाषा की जानकारी होना सामान्य के साथ ही जरूरी भी है। हिन्दी जहां हमारी राजभाषा है, वहीं अंग्रेजी के बिना इस ग्लोबल जगत में आगे बढ़ पाना मुश्किल है। ज्यादा से ज्यादा भाषाओं की जानकारी होने से आपकी पहुंच उन भाषा के साहित्य औरसंस्कृति तक भी बनती है। आज यदि आपको हिंदी और अंग्रेजी दोनो भाषाओं की अच्छी जानकारी  है, तो आपकी यह खूबी आपको बेहतर करियर ऑप्शन भी दिलाती है। आज हर क्षेत्र में अंग्रेजी-हिन्दी अनुवादक के काम को सराहा जाता है। अनुवाद में रुचि होने पर आप घर बैठे भी आसानी से पैसे कमा सकते हैं। एक अच्छे अनुवादक के लिए सबसे जरूरी है समय के साथ अंग्रेजी-हिन्दी अनुवाद की दुनिया में आए बदलाव, चलन और बहसों की जानकारी होना और उस आधार पे खुद को अपडेट रखना। ब्लॉग ‘अनुवाद की दुनिया’ आपको इन्हीं जानकारियों के लिए अपनी ओर खींचता है। ब्लॉग पर आपको अंगे्रजी के शब्दों को देवनागरी लिपि में लिखने की प्रचलित विधि और चली आ रही अशुद्धियों में सुधार की जानकारी मिलती है। यह ब्लॉग आपको अंग्रेजी-हिन्दी अनुवाद में मदद के लिए ऑनलाइन लिंक्स उपलब्ध कराता है। इसके अलावा इस ब्लॉग के माध्यम से अपको हिन्दी भाषा के नए शब्द और नई बहसों से भी रूबरू होने का मौका मिलता है। 

ब्लॉग का पता है- anuvaadkiduniya.blogspot.com

राजस्थान पत्रिका के एजुकेशन सप्लीमेंट ' मी नेक्स्ट ' में दिनांक -10 दिसम्बर 2011  को प्रकाशित। 

Saturday, December 10, 2011

व्हाट इज नेक्स्ट डूड !


टेक्नोलॉजी और गैजेट्स में इंट्रेस्ट रखने वाले हर यूजर की जुबां पर एक आम सवाल है- 'व्हाट इज नेक्स्ट'। पीसी, लैपटॉप, स्मार्टफोन से लेकर सोशल साइट्स, ब्लॉगिंग और क्रिएटिव वेबसाइट्स ने आज के यूथ को एक  वर्चुअल वर्ल्ड दिया है। एक ऐसा वर्ल्ड जहां हर पल कुछ नया, बेहतर और इंट्रेस्टिंग होता रहता है। ऐसे में सबसे पहले नई जानकारियों तक अपनी पहुंच बनाना, गजेट्स के लॉन्चिग से पहले उसके फीचर्स को इवेल्युएट करना और नए आपरेटिंग ट्रिक्स को  जानना अपने आप में इंट्रेस्टिंग काम है। जी हां, हमारा आज का ब्लॉग 'ऑनलाइन इंस्पिरेशन' कुछ ऐसी ही जानकारियों से जुड़ा हुआ है या शायद उससे कहीं ज्यादा!

इस ब्लॉग के होम पेज पर आपको हर दो-तीन दिन में अपडेशन के साथ लेटेस्ट पीसी ट्रेंड, साफ्टवेयर डाउनलोड, गैजेट्स रिव्यू के साथ ही रोचक टेक्निकल न्यूज मिल जाएंगे। होमपेज के राइट और लेफ्ट साइड में ऊपर से नीचे की ओर अलग-अलग सेक्शन्स में फ्री सॉफ्टवेयर डाउनलोड, कंप्यूटर और इंटरनेट सिक्यूरिटी टिप्स से लेकर ऑनलाइन ऑफर्स, ब्लॉगर्स कॉर्नर, फेसबुक टिप्स, मोबाइल सॉफ्टवेयर एंड ट्रिक्स जैसे कई लेटेस्ट यूजफूल आर्टिकल्स उपलब्ध हैं। सास बात यह है कि यहां आपको हर टिप्स एंड ट्रिक्स को स्टेप वाइज पिक्चर्स के साथ बताया गया है, जिससे यह यूजर्स के लिए ईजी अंडरस्टैंडेबल है।

उम्मीद है यहां आपको आपके 'व्हाट इज नेक्स्ट' का जवाब मिल जाएगा!! 
ब्लॉग का पता है- skvnet.blogspot.com


राजस्थान पत्रिका के एजुकेशन सप्लीमेंट ' मी नेक्स्ट ' में दिनांक - 3 दिसम्बर 2011  को प्रकाशित। 

Monday, September 5, 2011

भ्रष्टाचार, सदाचार और आंदोलन


चार लाख लोग। दो सौ शहर। बारह दिन। एक नेता और एक नारा “एक-दो-तीन-चार नहीं सहेंगे भ्रष्टाचार”। भ्रष्टाचार के विरोध में जनयुद्ध रुपी अन्ना हजारे के अनशन को खत्म हुए लगभग एक सप्ताह हो गया है।आजादी के बाद (वाया जेपी आंदोलन) यह एक ऐसी ऐतिहासिक लड़ाई रही, जिसने सदन में बैठे लोगों को यह बखूबी समझा दिया कि जनता से ही देश और उनका अस्तित्व है, न की देश और उनसे, जनता का। आजादी के बाद यूं तो कई छोटे-मोटे आंदोलन हुए, लेकिन ऐसा जनसमर्थन और स्वस्फूर्त उद्गार शायद ही देखने को मिला। इसमें कोई शक नहीं है कि भ्रष्टाचार ने हमारे समाज और इसके तंत्र को ऊपर से नीचे तक अपनी चपेट में लिया हुआ है। भ्रष्टाचार से तंग जनता ने इस आंदोलन में अपनी ताकत को पहचाना है। यही कारण है कि युवाओं से लेकर बूढों तक सब ने इस आंदोलन में शिरकत की। यह आंदोलन अपने मकसद में कितना सफल हुआ और कितना नहीं यह तय करने में अभी समय लगेगा, क्योंकि लोकपाल विधेयक का शीतकालीन सत्र से पहले पारित होने के कोई आसार फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं, लेकिन इस आन्दोलन ने हमें एक ऐसा विषय दिया है जिसपर विचार करना जरुरी हो गया है।
भ्रष्ट आचार, यानि कोई भी ऐसा कृत्य जो अनैतिक हो भ्रष्टाचार है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कुछ भी अनैतिक करना भ्रष्टाचार है, तो ऑटो में बिना मीटर चलवाये बैठना और बस में बिना टिकट लिए कडंक्टर से सस्ते में निपट लेना, क्या भ्रष्टाचार नहीं है? कहने का अर्थ यह कि आज सबसे पहले हमें भ्रष्टाचार को परिभाषित करने की जरुरत है। आन्दोलन के दौरान सड़को पर विरोध में नारे लगाना तो समझ में आता है पर बेखौफ और बेरोकटोक ठाठ से सड़क के नियमों को तोड़ना और फिर भ्रष्टाचार की हाय-हाय करना, खुद को गाली देने जैसा ही जान पड़ता है। ये तो महज् छोटे उदाहरण हैं, यदि खुद के दैनिक क्रियाकलापों पर ही गौर करें तो हम जान पाएंगे कि भ्रष्टाचार कैसे हमारे दिनचर्या में सहज तरीके से फिट हो गया है। स्थिति ऐसी है कि हम यह अंदाजा ही नहीं लगा पाते कि हम कहां और कितने भ्रष्ट हैं।
इस पूरी मंत्रणा के बाद सवालों के घेरे में हम खुद आ जाते हैं कि क्या हम इस तरह एक भ्रष्टाचार मुक्त समाज और तंत्र का निर्माण कर पाएंगे? क्या बिना खुद में परिवर्तन लाए हम सामने वाले से सदाचार की उम्मीद रख सकते हैं? यकीनन नहीं। वस्तुस्थिति ऐसी है कि आंदोलन के दौरान जहां एक ओर हम गांधी जी के आर्दर्शो को सिर-माथे लेकर घूम रहे थें, वहीं दूसरी ओर गांधी जी के “आप भला तो जग भला” कथन की अनसूनी भी कर रहे थें। हम भूल रहे हैं कि यदि स्थितियों में बदलाव लाना है तो हमें स्वयं को भी बदलना होगा। अन्ना के साथ भावनाओं का जुड़ना और समर्थन में जनसैलाब का उमड़ना इसी कारण संभव हो पाया कि अन्ना की छवि एक निःस्वार्थ और ईमानदार नेतृत्वकर्ता की रही है, एक ऐसा नेता जो सामाजिक मकसद के लिए लड़ाई लड़ता आया है और अपनी जान तक देने को तैयार है।
भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है, खुद अन्ना ने भी मंच से कहा कि यह आधी जीत है। मेरी समझ से भ्रष्टाचार के खिलाफ यह लड़ाई तब तक खत्म नहीं हो सकती जबतक की हम खुद से लड़कर, अपने अंदर के भ्रष्टाचार को भी खत्म नहीं कर लेते। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आंदोलन एक शुरुआत है। व्यवस्था तंत्र को सुदृढ और जिम्मेदार बनाने के लिए अनेकों और आंदोलनों की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि हम व्यवस्थागत भ्रष्टाचार के साथ-साथ व्यक्तिगत भ्रष्टाचार को भी खत्म करने का प्रयास करें, ताकि सही मायने में भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल सके। 

Tuesday, August 16, 2011

आज़ादी की खीर


आठ साल के बबलू को उसकी मां सुमिता ने आज अहले सुबह 5 बजे ही जगा दिया है। ना नुकुर करता बबलू अभी और सोना चाहता है। सुमिता उसे याद दिलाती है कि आज 15 अगस्त है। मां की बात सुनते ही बबलू झट से उठ जाता है। उसकी नींद 15 अगस्त का नाम सुनते ही छु-मंतर हो गई है। आधे घंटे में बबलू तैयार होकर मां के साथ अपने छोटे से तंबुनुमा घर से बाहर निकल आता है। बगल के स्कूल में सारें जहां से अच्छा... गीत बज रहा है। बबलू को यह सब बहुत अच्छा लगता है। तभी सामने के घर से जुम्मन चाचा अपने बेटे फारूक के साथ निकलते हैं। चाचा अपने हाथ में थामें झोले को खोलते हैं जिसमें सैकड़ों छोटे-छोटे प्लास्टिक के तीरंगे झंडे हैं।

रोज की जिंदगी से इतर आज का दिन बबलू के लिए खास है। आज उसे ट्रैफिक पर हाथ फैलाने की बजाय लोगों को झंडा बेचना है। वह और उसकी मां पिछले कई दिनों से इस दिन के लिए पैसें जमा कर रहे थें, ताकि झंडे खरीदकर वह उन्हें सडकों पर बेच सके। आज कमाई ज्यादा होगी। बबलू की मां ने आज दोपहर उसे खीर खिलाने का वादा किया है। 

बबलू और उसकी मां अपने घर के पास वाले चौराहे पर ही झंडे लेकर खड़े  हो जाते हैं जबकि चाचा अपने बेटे, जो बबलू से उम्र में 2 साल बड़ा है, के साथ शहर के मुख्य चौराहे पर गए हैं। चाचा हर रोज इसी तरह नयी चीजे लेकर बेचने निकलते हैं। करीब 15 मिनट के इंतजार के बाद सड़क पर हलचल बढ़ जाती है। रंग-बिरंगे और साफ-सुथरे कपड़ों में स्कूली बच्चों का दल प्रभात फेरी के लिए निकल चुका है। सड़क पर भीड़ बढ़ रही है। बबलू दौड़-दौड़कर लोगो को झंडे लेने के लिए प्रलोभित कर रहा है। कई बार पुलिस घेरे के अंदर घुस जाने पर उसे पुलिस वालों ने डंडे भी दिखाए, जिस पर वह हंसता हुआ वहां से भाग गया। इधर सुमिता का ध्यान झंडा बेचने के साथ ही बबलू पर लगा हुआ है। वह हर पल उसपर नजर बनाये हुई है। वह कई बार बबलू को डांटती भी है। वह कहती है, ‘क्या पता सड़क पर बेखबर दौड़ती गाडिय़ों से कहीं कुछ अनहोनी ना हो जाए।’

करीब साढ़े तीन घंटे बाद, सड़क पर भीड़ अब कम हो चली है। सुमिता, बबलू से कहती है कि चल अब शायद कोई नहीं खरीदने वाला, घर चलते हैं। बबलू के हाथ में एक झंडा बचा हुआ है वह उसे बेच कर जाने की  जिद कर रहा है। मां उसके जिद के आगे लाचार है, तभी सामने से एक युवा दंपत्ति की गाड़ी ट्रैफिक पर रूकती है। बबलू अपनी मासूम आवाज में झंडे खरीदने को कहता है। इस तरह उसका आखिरी झंडा भी बिक गया। वह कूदते हुए मां को आखिरी झंडे के पैसे दिखाता है और घर चलने के लिए कहता है।

घर पर चाचा और फारूक अच्छी कमाई होने को ले उत्साहित हैं। मां खीर बना रही है। बबलू और फारूक बचे हुए कुछ झंडों से आजादी-आजादी खेल रहे हैं। दोनों सारे जहां से अच्छा... टूटे-फूटे लफ्जों में गा रहे हैं। खीर बन गया है। सुमिता बबलू को खीर परोसती है। खीर की खुशबु से बबलू का चेहरा खिला हुआ है। सुमिता खीर खा रहे बबलू को एकटक देख रही है। अचानक उसकी आंखों से आंसूओं की धारा बह निकलती है। उसका मन आज वापस गांव जाने को कर रहा है। 

आज सुबह स्कूली बच्चों को देख सुमिता को एक साल पहले गांव में अपने जीवन की याद आ गयी, जब वह 15 अगस्त को सुबह उठ बबलू को पड़ोस के सरकरी स्कूल के लिए तैयार करती थी। पर आज कुछ भी वैसा नहीं है। गांव के जिस जमीन पर वह काम करती थी उसे सरकार ने अधिग्रहित कर लिया है। वहां अब बड़े-बड़े मकान बनने हैं। उसका पति उन्हें छोड़ विदेश कमाने गया है। दो साल हो गए, उसकी कोई खोज-खबर नहीं है। गांव वाले कहते हैं कि वो किसी दुर्घटना में मर गया है, लेकिन सुमिता यह मानने को तैयार नहीं है। गांव वालों के उलाहने से परेशान सुमिता, बबलू को ले पास के शहर आ गई है... काफी कोशिशों के बाद भी काम न मिल पाने के कारण वह सड़को पर           हाथ फैलाने के लिए मजबूर है।....

बबलू के आवाज लगाने पर सुमिता का ध्यान टूटा। बबलू खीर खत्म कर चुका है। वह मां से उसके रोने की वजह पूछता है। सुमिता कुछ  नहीं बोलती है, बस अपने आंचल से आंसु पोंछते हुए बबलू को अपने सीने से लगा लेती है। मां के आंचल की गर्मी में बबलू अब सो चुका है और सुमिता दूर कहीं शून्य को निहार रही है।....


जनसत्ता समाचार पत्र के "समांतर" स्तंभ में दिनांक- 06 सितम्बर 2011 को प्रकाशित

Sunday, May 29, 2011

भाषा और व्यक्तित्व : क्या और कितना है संबंध

मनोवैज्ञानिकों से लेकर समाज वैज्ञानिकों तक में यह सवाल हमेशा से प्रबल रहा है कि क्या भाषा हमारे व्यक्तित्व पर प्रभाव डालती है?  इस विषय से संबंधित शोध निष्कर्षों ने यह साबित किया है कि हमारी भाषा का हमारे व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव रहता है। यह ना सिर्फ हमारे बोलचाल बल्कि हमारे सोचने के तरीके को भी तय करती है।
    भाषा असल में हमारे आपसी संचार में सबसे प्रभावी तत्व है, इसके बिना हम सफल संचार की  कल्पना तक  नही कर सकते। ऐसे में जब हम किसी भाषा को सीखते हैं तो इसके साथ ही हम उस भाषा से संबंधित संस्कृति और परंपराओं को भी ग्रहण करते हैं। उदाहरण के लिए हम जिस किसी क्षेत्र में रहते हैं, बोली बोलते हैं तो धीरे-धीरे हमारी चाल-ढाल और हमारा आचरण भी उसी क्षेत्र विशेष की तरह हो जाता है। विचार किजिये  कि जब हम कार्यालय या किसी अन्य जगह पर अंग्रेजी का प्रयोग कर रहे होते हैं तो ऐसे स्थानों पर हमारे पहनावे से लेकर हमारे तौर-तरीको में भी अंग्रेजीयत झलकती है, वहीं जहाँ हम राजभाषा हिंदी का प्रयोग कर रहे होते हैं तो वहां हमारे आचरण और विचारों में थोड़ी सौम्यता आ जाती है, हम अपने से बड़ो के लिए आप आदि जैसे शब्दों का प्रयोग कर हमारी संस्कृति का परिचय देते हैं। यहां इसका अर्थ यह नहीं कि अंग्रेजी में बड़ो का सम्मान नही होता पर हाँ, यह जरूर है हिंदी में इसकी  थोड़ी अधिकता है। कहने का तात्पर्य यह कि हिंदी स्वाभाव से ही एक सौम्य भाषा है, जबकि अंग्रेजी में इसकी तुलना थोड़ी आक्रामकता है।
         अब बात यह कि भाषा कैसे हमारे सोचने के तरीके को तय करती है। इसके दो सबसे बेहतरीन उदाहरण हमारी मीडिया और युद्ध के समय सेना को दिये जाने वाले संदेशो की भाषा है। गौर करे तो दिन भर में हमारी मीडिया द्वारा कई एक  तरह की खबरें दी जाती है। निश्चित है कि  खबरों की विधा अलग-अलग होती है और फलस्वरूप खबर की भाषा शैली में भी अंतर होता है। ऐसे में जब हमारी मीडिया किसी उल्लासपूर्ण खबर का  वाचन कर रही होती है तो उसकी भाषा में वह उल्लास दिखता है और उस खबर पर विचार के दौरान हमारे अन्दर भी उसी उल्लास का संचार होता है। वहीं किसी  दुखद घटना के  दौरान उसकी भाषा शैली से हमारे अंदर उसीके समान दुख का संचार होता है। ठीक इसी तरह युद्ध के दौरान जब सेना को संदेश दिये जाते है तो उसकी  भाषा शैली में एक उर्जा होती है जो उन्हें युद्ध के मैदान में आगे बढऩे के  लिए प्रेरित करती हैं। 
    हमारे व्यवहारिक जीवन में भी यह देखने को मिलता है कि  यदि किसी स्थान पर इस्तेमाल की जाने वाली भाषा सभ्रांत होती है तो वहां के लोगों के  व्यक्तिव और आचरण में एक सु-संस्कृति  झलकती है। वहीं इससे इतर यदि किसी स्थान की भाषा मर्यादित न हो तो वहां के लोगों के विचार और तौर-तरीको का भी गैर मर्यादित होना साफ दिखता है।

Thursday, April 7, 2011

ये साली जिंदगी: बोल्डनेस और गंभीरता का अनूठा मेल


इन दिनों बॉलीवुड में गंभीर फिल्में बनाने वाले निर्देशकों का रूख बदला है। पिछले दिनों मधुर भंडारकर जो अपनी लीक से हटकर और सार्थक सिनेमाशैली के लिए जाने जाते हैं ने अपनी गंभीर शैली से अलग “दिल तो बच्चा है जी” बनाई। इसी क्रम को आगे बढाते हुए अपनी फिल्मों से अलग पहचान बना चुके सुधीर मिश्रा जिनकी पिछली फिल्में “हजारों ख्वाहिशें ऐसी” और “इस रात की सुबह नहीं” भले ही बॉक्स ऑफिस पर टिक नहीं पाई, लेकिन इन फिल्मों को खास दर्शकवर्ग ने पसंद किया। इन फिल्मों ने समीक्षकों से भी जमकर वाहवाही लूटी।



फिलहाल, सुधीर की इस फिल्म को देखकर लगता है शायद उन्होंने इस बार बॉक्स ऑफिस की कसौटी पर खड़ा उतरने की चाह में कहीं न कहीं कोई समझौता किया है। वर्ना, दो अलग अलग स्टाइल की प्रेम कहानियों को जरूरत से ज्यादा हॉट सीन और डेढ़ दर्जन से ज्यादा चुंबन दृश्य को फिट किए बिना भी आसानी से कहा जा सकता था।



फिल्म की रिलीज से चंद दिन पहले सुधीर ने एक दैनिक से बातचीत के दौरान दबे स्वर में इस सच को कबूला कि “रोजी रोटी चलानी है, तो इंडस्ट्री में हजारों ख्वाहिशें.. और इस रात.. जैसी फिल्मों के दम पर टिका नहीं जा सकता, आपको ऐसा भी कुछ करना पड़ता है जो लोग चाहते है।” ऐसा नहीं है कि सुधीर की इस फिल्म में उनकी पिछली फिल्मों जैसा कुछ भी नहीं है, इस फिल्म की कसी हुई पटकथा और अपनी बात को कहने का सुधीर का अंदाजे बया कुछ ऐसा है, जो दर्शक को अंत तक बांधने का दम रखता है। वर्ना, अंडरवर्ल्ड और गुनाह की दुनिया से जुड़े दो किरदारों की प्रेम कहानी को सरल ढंग से भी कहा जा सकता था। लेकिन, फिल्म में हर पल कुछ ऐसा घटित होता है, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। फिल्म की शुरुआत में गोलियों और गालियों की बौछार के बीच कहानी को फ्लैश बैक का सहारा लेकर आगे बढ़ाने का मजेदार अंदाज, सुधीर जैसे निर्देशक ही कर सकते है। इस फिल्म की टैग लाइन है कुछ गोलियां मार डालती हैं, तो कुछ गोलियां जान बचाने के काम में आती हैं।

फिल्म की कहानी प्रीति (चित्रांगदा सिंह) और अरुण (इरफान खान) से शुरू होती है। अरूण, प्रीति को बहुत चाहता है, लेकिन अपने प्यार को चाहकर भी बयां नहीं कर पाता। प्रीति श्याम को चाहती है और हालात कुछ ऐसे बनते है कि अरुण को प्रीति से पहले श्याम को बचाना है। श्याम जल्दी ही एक बड़े नेता का दामाद बनने वाला है। वहीं कुलदीप (अरुणोदय सिंह) को भी एक काम पूरा करना है, फिरौती और भाईगीरी के धंधे में लगे कुलदीप का जेल आना जाना उसकी बीवी शांति (अदिति राव) को पसंद नहीं। कुलदीप को इस धंधे से छुड़ाने के लिए शांति उसे धमकी देती है कि वह इस धंधे को हमेशा के लिए छोड़ दे, वर्ना वह हमेशा के लिए उसका घर छोड़ कर चली जाएगी। कुलदीप को शक है कि शांति का किसी और से चक्कर है और इसलिए वह उसे हमेशा छोड़ना चाहती है। कुलदीप को मंत्री के होने वाले दामाद श्याम को किडनैप कर उससे मोटी रकम वसूलनी है। अरुण को जब पता चलता है कि प्रीति मुसीबत में है, तो वह उसे इस मुसीबत से निकालने का मकसद लेकर एकबार फिर उसकी जिंदगी में आता है। प्रीति और शांति की लव स्टोरी में अंडरवर्ल्ड का खूनी खेल, फिरौती वगैरह सब कुछ है, लेकिन फिल्म के आखिर तक हॉल में बैठा दर्शक क्लाइमैक्स का अंदाजा ही लगा पाता है।

फिल्म के अभिनय पक्ष को देखे तो कुलदीप के रोल में अरुणोदय पूरी तरह से फिट है। सुधीर मिश्रा की चहेती चित्रांगदा ने फिर साबित किया कि अपने रोल के साथ न्याय करना वह अच्छी तरह से जानती हैं। अदिति राव ने ऐक्टिंग से ज्यादा चुंबन दृश्य को करने पर ध्यान दिया और एक फिल्म में सबसे ज्यादा चुंबन का रेकॉर्ड अपने नाम किया। यशपाल अपने रोल के साथ न्याय किया है। सुशांत ने एक बार फिर वही किया जो इससे पहले भी कई बार कर चुके हैं, लेकिन ये भी सच है कि इस तरह के रोल में वो जंचते हैं।



सुधीर ने अपनी इमेज के विपरीत इस बार अपनी कहानी का अलग तरह का अंत किया है। वहीं, सिंपल कहानी को किस तरह से तोड़मरोड़ कर उसमें बॉक्स ऑफिस पर बिकाऊ मसालों को परोसा जाए, इस काम में भी सुधीर पीछे नहीं रहे। जरूरत से ज्यादा अश्लील गालियों और मिनटों तक लंबे चुंबन दृश्यों को दिखाना समझ से परे है।

संगीत पक्ष में फिल्म का टाइटिल गाना “ये साली जिंदगी” म्यूजिक चार्ट में अपनी जगह बना चुका है। वहीं तेज रफ्तार से चलती इस कहानी में गानों की ज्यादा गुंजाइश भी नहीं थी। अजय झींगरन का गाया मोरा पिया का फिल्मांकन बेहतरीन है और अजय की सुरीली आवाज ने इस गाने में जान डाल दी।



अगर आप लीक से हटकर, बोल्ड और कुछ ऐसा देखना चाहते है जो बहुत हद तक समाज में हो रहा है, तो ऐसे सच को देखने के लिए फिल्म देखी जा सकती है। वर्ना बोल्ड सीन और सेंसर की मेहरबानी से डबल मीनिंग डायलॉग और गालियों से मालामाल इस फिल्म में फैमिली और साफ सुथरी फिल्मों के शौकीनों के लिए कुछ भी नहीं। एक और बात जो इस फिल्म के संदर्भ में समझ से परे है कि सेंसर बोर्ड ने फिल्म के टाईटल में “साली” शब्द को ले अपने नाक-भौं सिकोड़ लिये लेकिन 21चुंबन दृश्यों को लेकर सेंसर बोर्ड में कोई कानाफूसी भी नहीं है।

Sunday, February 20, 2011

आप सुन रहे हैं, बीबीसी हिन्दी ।।


शाम का समय है। आंगन में लगे खाट पर बैद्यनाथ चाचा लेटे हुए हैं और खुले आसमान में तारों की टिमटिमाहट को निहार रहे हैं। इतने में चाचा की 12 साल की पोती खाना लेकर आती है, पर न जाने क्यों चाचा आज खाने से इंकार कर देते है!

बैद्यनाथ चाचा, बिहार के मधेपुरा जिले के एक छोटे से गांव ईटवा के रहने वाले हैं। चाचा यहॉ के एकमात्र मध्य विद्यालय में शिक्षक हुआ करते थे। सेवानिवृति के बाद भी चाचा ने पठन-पाठन नहीं छोड़ा और आज भी लगभग हर शाम गॉव के लोग, चाचा से देश-विदेश की जानकारी लेने और समझने के लिए इक्ठ्ठा होते हैं। चाचा का गॉव आज भी विकास की बाट जोहता है। गॉव में अखबार तब ही आता है, जब कोई 10 कि0मी0 दूर शहर जाता है। चाचा हमेशा से गॉव के लोगों के लिए खबरों के एक विश्वसनीय स्रोत रहें हैं।

गॉव के लोगों और बैद्यनाथ चाचा के लिए रेडियो, समाचार और सूचनाओं का एकमात्र उपलब्ध माध्यम है। आम दिनों की तरह आज जब शाम 7 :30 बजे चाचा रेडियो पर बीबीसी समाचार सुन रहे थे, तो एक खबर ने चाचा को शांत और गमगीन होने पर मजबूर कर दिया। खबर थी कि “ पहली अप्रेल से वित्तीय घाटे की वजह से बीबीसी रेडियो का हिन्दी प्रसारण बंद हो रहा है।”

रेडियो पर खबर के मामले में बीबीसी का अपना एक अलग रुतबा रहा है। या यू कहें कि रेडियो पर समाचार का अर्थ ही बीबीसी है, तो मेरी समझ से इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। 11 मई 1940 को पहली बार बीबीसी लंदन से हिन्दी में प्रसारण हुआ था। शुरुआती दिनों में “बीबीसी हिन्दुस्तानी सर्विस” के नाम से शुरू किए गए इस प्रसारण का उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उपमहाद्वीप के ब्रितानी सैनिकों तक समाचार पहुंचाना था। वर्ष 1994 में दिल्ली में बीबीसी का हिन्दी सेवा ब्यूरो बनाया गया। अपने शुरुआती दिनों से लेकर अबतक के अपने इस 70 साल के सफर में बीबीसी ने समाचार जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। बीबीसी हिन्दी सेवा अपनी विशिष्ट भाषा शैली और निष्पक्षता के लिए हमेशा से जानी जाती रही है।

“अगर सही खबर चाहिए तो बीबीसी सुनिये।” पूरे विश्व में यह एक मुहावरा बन चुका है और यह बीबीसी की उत्कृष्टता का सबसे बड़ा उदाहरण है। लेकिन, यह उत्कृष्टता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता बैद्यनाथ चाचा और उन जैसे करोड़ो लोगों के लिए बस यादें बन कर रह जाएंगी। एक अपुष्ट आंकड़े की माने तो बीबीसी हिन्दी रेडियो सेवा बंद होने से कुल तीन करोड़ लोग प्रभावित होंगे। खुद बीबीसी इस आंकड़े को दो करोड़ तक मानता है। ऐसे में सवाल उठता है कि केवल रेडियो पर खबरों के लिए आश्रित लोगों के पास  अब क्या विकल्प बचते हैं?

रेडियो पर बीबीसी के अलावा हिन्दी में “एआईआर आकाशवाणी” ही एकमात्र लेाकप्रिय विकल्प है। हालांकि “रेडियो डॉचीवेले” और “रेडियो जर्मनी” भी समाचार प्रसारण करते हैं पर जैसा कि पहले ही स्पष्ट है, कि ये उतने लोकप्रिय नहीं हैं। अब बात आकाशवाणी की तो यह रेडियो स्टेशन प्रसार भारती प्रसारण बोर्ड के अन्दर ही आता है, वैसे कहने के लिए तो यह बोर्ड एक स्वायत्त संस्था है लेकिन इसकी स्वायत्ता कितनी प्रभावी है ये जगजाहिर है। यानि स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि इसकी खबरों पर सरकार का कमोबेश नियंत्रण रहता है। ऐसे में निष्पक्षता जैसे शब्द बेमानी साबित होते हैं। एक और विकल्प के तौर पर एफएम रेडियो चैनल्स आते हैं पर वर्तमान में “एफएम गोल्ड” और “एफएम रेनबो” जो एआईआर आकाशवाणी के ही अंग हैं, के अलावा किसी अन्य को समाचार प्रसारण की ईजाजत नहीं है। पता नही एफएम चैनलों (गैर सरकारी) पर समाचार प्रसारण को लेकर सरकार इतने संशय में क्यों है?

यानि लब्बोलुबाब यही है कि एक अप्रेल से बीबीसी हिन्दी प्रसारण बंद होने से निश्चित तौर पर रेडियो पर समाचार प्रसारण का एक स्वर्णीम युग बीत जाएगा। तथ्य है, कि किसी भी राष्ट्र के विकास में सूचना और संचार सबसे अहम् होते हैं। प्रथम, द्वितीय और तृतीय विश्व के देशों में विकसीत, विकासशील और पिछड़ा होने का अंतर बहुत हद तक इसी सूचना और संचार के असंतुलन के कारण है। यानि कि देश की एक बड़ी आबादी तक पुष्ट और निष्पक्ष सूचनाओं के न पहुंचने से अब विकास की कल्पना करना मूर्खता होगी।

हालांकि बीबीसी हिन्दी समाचार प्रेमियों के लिए वेब पर बीबीसी हिन्दी सेवा जारी रहेगी। लेकिन यह भी सच्चाई है कि हमारे देश में अभी भी महज् 6.9 प्रतिशत लोगों तक ही इंटरनेट की पहुंच है। वर्तमान में मोबाईल क्रांती और 3जी की शुरुआत होने से इसकी संख्या निश्चित तौर पर बढेगी, लेकिन फिर भी बैद्यनाथ चाचा और उनके जैसों के गॉवों तक इंटरनेट को पहुंचने में काफी समय लगेगा।

ऐसे में सवाल उठता है कि, क्या सरकार रेडियो समाचार प्रसारण की नीति में कोई अहम् बदलाव लाएगी या फिर अपने विकास के ईमारत को केवल कागजों पर खिंचती रहेगी।